महाकाली की पूजा करने से मिलता है मनचाहा वरदान।

दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। प्राचीन काल की बात है,सम्पूर्ण सृष्टी के जलमगन होने के बाद भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा लीन में थे। तभी उसी समय अचानक, भगवान विष्णु के कान से मधु और कैटभ नाम के दो पराक्रमी असुर उत्पन्न हुए। यह दोनों असुर भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए कमल के फूल के ऊपर विराजमान ब्रह्मा जी को खाने के लिए उन्हें मारने का प्रयास करने लगे। जब ब्रह्माजी ने देखा कि दोनों असुर उन पर आक्रमण कर रहें हैं, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिये आदिशक्ति की स्तुति की और उनसे मदद मांगी । उन दोनों असुरों के वध हेतु माँ आदिसक्ति,फाल्गुन शुक्ला की द्वादशी को माँ महाकाली के रूप में अवतरित हुई। उसी पल भगवान विष्णु भी योगनिद्रा से उठ गयें और अपने समक्ष मधु और कैटभ नाम के असुर को देखते हैं,तो वे दोनों असुरों के साथ युद्ध करनें लगे । पाँच हज़ार वर्षों तक ,यह घन-घोर युद्ध चलता रहता है। परंतु भगवान उन्हें परास्त करने में असफल हुयें क्यों की दोनों असुरो को माँ आदिशक्ति ने इच्छा मृत्यु का वर दिया था। इसलिए भगवान विष्णु ने माँ महाकाली की स्तुति की । तब देवी माँ ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु को दोनों असुरों के अंत का वर दिया। देवी माँ की माया के प्रभाव से समोहित होकर दोनों असुर भ्रमित हो गयें । वे दोनों भ्रमित असुर भगवान विष्णु से कहते है,कि युद्ध से प्रसन्न होकर हम आपको वर देना चाहते हैं । इसलिए आप हमसे अपनी इच्छानुसार वर माँग सकते है। तब भगवान विष्णु उनसे कहते हैं,कि यदि तुम लोग मुझसे प्रसन्न हो तो मुझे यह वरदान दो कि तुम्हारी मृत्यु मेरे द्वारा हो जाये। माँ महाकाली की माया से भ्रमित वे दोनों असुर भगवान विष्णु को यह वरदान दे देते हैं,की आपके द्वारा हमारी मृत्यु होगी। तत्प्रश्चात ,भगवान् विष्णु दोनों असुरों के मस्तक को सुदर्शन चक्र से काट देतें हैं।  उनकी मृत्यु के प्रश्चात माँ महाकाली विश्राम के लिए हिमालय चली जाती है। कुछ समय के बाद,पाताल से दो असुर भाइयों शुंभ-निशुंभ का आगमन होता है। जो पृथ्वी पर अपना अधिपत्ये हेतु देवी माँ आदिशक्ति को युद्ध की चुनौती देतें है वे माता से युद्ध करने हेतु असुर रक्तबीज को भेजते हैं। असुर रक्तबीज को ब्रहमा जी से यह वरदान प्राप्त था की उसके रक्त की बूंद जहां भी जितनी भी गिरेगी वहाँ उतनी ही असुर रक्तबीज उत्पन्न हो जाएगें। वरदान के फलस्वरूप ,माँ आदिशक्ति जब भी रक्तबीज पर प्रहार करती थी। तब उसी समय रक्तबीज के घाव से रक्त की धरा के बूंद-बूंद से अनेक रक्तबीज उत्पन्न हो जाते थें। यह देखकर माँ आदिशक्ति ,माँ महाकाली के रूप में वहाँ अवतरित हुई । माँ महाकाली ने वहाँ अपने समान असंख्य योगनियों (देवियों) को प्रकट किया । तत्पश्चात, माँ महाकाली ने उन्हें आदेश दिया की,इन असुरो के रक्त के एक-एक बूंदों को पृथ्वी पर गिरने मत देंना। सारें रक्त को खप्पर में भरकर पी जाओ। माँ महाकाली और अन्य देवियाँ असुरों का रक्त धरती पर गिरने से पहले ही उसे पी जाती थी । इस प्रकार माँ महाकाली ने रक्तबीज का वध किया । उसके पश्चात ,दोनों असुर भाई शुंभ और निशुंभ माता से युद्ध करनें के लिए आयें । माँ ने दोनों असुर भाईयों का वध कर पृथ्वी को उनकें भार से मुक्त किया। और देवताओं को उनके आतंक से मुक्ति प्रदान की। माँ महाकाली के अनेक रुप हैं ,इन्हें श्यामा, दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली) गुह्म काली, कालरात्री, भद्रकाली, महाकाली,श्मसान कलि,चामुंडा आदि नामों से संबोधित किया जाता है।

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